पितृपक्ष: पितरों से पहले क्यों किया जाता है ऋषि-मुनियों का तर्पण?

PITRA PAKSH

सांकेतिक तस्वीर / (फोटो क्रेडिट : आईएएनएस)

The Hindi Post

पितृपक्ष: पितरों से पहले क्यों किया जाता है ऋषि-मुनियों का तर्पण?

 

नई दिल्ली |  सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। 16 दिनों तक चलने वाले श्राद्ध पक्ष में हम अपने पितरों के लिए तर्पण और पिंडदान करते हैं, ताकि उनकी आत्मा को शांति मिले और उनका आशीर्वाद परिवार पर बना रहे।

मान्यता है कि इस दौरान पितरों का तर्पण करने से उन्हें मोक्ष की प्राप्ति होती है और पितृ दोष से मुक्ति मिलती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि पितरों का तर्पण करने से पहले कुछ महान ऋषि-मुनियों का तर्पण किया जाता है? बेहद कम लोगों को पता है कि श्राद्ध की शुरुआत सीधे पितरों से नहीं, बल्कि ऋषियों की पूजा से होती है।

ब्रह्मपुराण के अनुसार, मनुष्य को देवताओं की पूजा करने से पहले अपने पूर्वजों की पूजा करनी चाहिए और पूर्वजों से भी पहले ऋषियों का स्मरण करना चाहिए। जिस प्रकार किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत भगवान गणेश की पूजा से होती है, उसी प्रकार पितृ पक्ष के तर्पण का शुभारंभ भाद्रपद पूर्णिमा को अगस्त्य ऋषि के पूजन और तर्पण से होता है। कहा जाता है कि इस दिन ऋषि अगस्त्य के नाम से तर्पण करने से पितरों को मुक्ति मिलती है और वे पूरे वर्ष जल के लिए नहीं भटकते।

इससे जुड़ी एक रोचक कथा महाभारत के वन पर्व में मिलती है। प्राचीन काल में आतापी और वातापी नाम के दो क्रूर असुर भाई थे। आतापी के पास एक मायावी शक्ति थी, वह किसी भी मरे हुए प्राणी को आवाज देकर जीवित कर सकता था। वहीं वातापी किसी भी प्राणी का रूप धारण कर सकता था।

दोनों भाइयों ने ऋषि-मुनियों को मारने का एक भयानक तरीका निकाला। वातापी बकरे या भोजन का रूप ले लेता और आतापी किसी ऋषि को भोजन के लिए आमंत्रित करता। जैसे ही ऋषि वह भोजन खा लेते, आतापी वातापी को आवाज लगाता और वातापी ऋषि का पेट फाड़कर जीवित बाहर निकल आता। फिर दोनों असुर उस मृत ऋषि को अपना भोजन बना लेते। इस तरह उन्होंने सैकड़ों ऋषियों की हत्या कर दी।

परेशान होकर सभी ऋषि-मुनि महर्षि अगस्त्य के पास मदद मांगने पहुंचे। अगस्त्य मुनि अपनी तपस्या और बुद्धिमत्ता के लिए प्रसिद्ध थे। एक दिन वे दोनों असुरों के पास गए। योजना के अनुसार, आतापी ने वातापी को काटकर कई स्वादिष्ट व्यंजन बनाए और अगस्त्य मुनि को परोसे। मुनि ने सारा भोजन ग्रहण कर लिया। भोजन के बाद आतापी ने अपने भाई वातापी को आवाज लगानी शुरू की, लेकिन इस बार कुछ अलग हुआ।

मुनि ने तुरंत एक अंजुली जल को अभिमंत्रित करके पी लिया और कहा, “जिसे तुम आवाज दे रहे हो, वह अब कभी बाहर नहीं आएगा, क्योंकि मैंने उसे पचा लिया है—जीर्णो वातापि।”

यह सुनकर आतापी डर गया और क्रोधित होकर मुनि पर हमला करने दौड़ा, लेकिन महर्षि अगस्त्य ने अपने तपोबल से उसे वहीं भस्म कर दिया। वह दिन भाद्रपद पूर्णिमा का था। दोनों असुरों के अंत के बाद से ही पितृपक्ष के पहले दिन अगस्त्य मुनि और उनकी पत्नी लोपामुद्रा के नाम से तर्पण करने की परंपरा शुरू हुई।

अगस्त्य मुनि के अलावा पितृ पक्ष में कई अन्य महान ऋषियों का भी तर्पण किया जाता है। इनमें सप्तर्षि, ऋषि वशिष्ठ (जिन्होंने वेदों की व्याख्या की और धार्मिक शिक्षा दी), ऋषि जमदग्नि (जो भगवान परशुराम के पिता थे और धर्म के प्रचारक रहे), ऋषि विश्वामित्र, ऋषि भारद्वाज, ऋषि गौतम, ऋषि कश्यप आदि शामिल हैं।

शास्त्रों के अनुसार, इन ऋषियों ने मानव जाति को ज्ञान, धर्म और संस्कृति दी, इसलिए इन्हें देवतुल्य माना जाता है। इनका तर्पण करके हम ऋषि ऋण से मुक्त होते हैं और पितरों तक हमारा तर्पण बिना किसी बाधा के पहुंचता है। ऋषियों के आशीर्वाद के बिना पितृ तर्पण अधूरा माना जाता है।

BY IANS

पितृपक्ष: पितरों से पहले क्यों किया जाता है ऋषि-मुनियों का तर्पण?


The Hindi Post
error: Content is protected !!