भारत के दो नगीने : जान पर खेलकर इंसानियत को जिंदा रखा, अपने-पराए का भेद मिटाया, स्मित मच्छार और….

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फोटो: आईएएनएस

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भारत के दो नगीने : जान पर खेल कर बचाई इंसानियत, अपने-पराए का मिटाया भेद, स्मित मच्छार और….

 

नई दिल्ली | हजारों फीट की ऊंचाई पर उड़ता विमान जब अचानक संकट में घिरता है तो दिमाग काम करना बंद कर देता है. यात्रियों के पास सोचने के लिए बहुत कम समय होता है. ऐसे वक्त में विमान के पायलट और चालक दल का एक फैसला सैकड़ों जिंदगियों का भविष्य तय कर सकता है. स्मित मच्छार और नीरजा भनोट दो ऐसे ही नाम हैं जिन्होंने जान पर खेलकर दुनिया को इंसानियत का पाठ पढ़ाया. ये नहीं देखा कि लोग अपने हैं या पराए! याद रखा तो सिर्फ कर्तव्य और मानव सेवा का मर्म.

1986 में नीरजा भनोट के बलिदान से लेकर 2026 में कैप्टन स्मित मच्छार की बहादुरी तक, दोनों ने पूरी दुनिया में भारत का मान बढ़ाया है.

शुरुआत भनोट से! 5 सितंबर 1986 को पैन एम की फ्लाइट 73 को कराची एयरपोर्ट पर आतंकवादियों ने हाईजैक कर लिया था. विमान में सैकड़ों यात्री सवार थे और स्थिति लगातार गंभीर होती जा रही थी. उस समय विमान की वरिष्ठ फ्लाइट अटेंडेंट नीरजा भनोट ने असाधारण साहस का उदाहरण पेश किया था.

पायलटों के विमान से निकल जाने के बाद यात्रियों की सुरक्षा का पूरा जिम्मा नीरजा और उनकी टीम पर आ गया था. आतंकियों ने जब पासपोर्ट जमा करने को कहा तो नीरजा ने समझदारी दिखाते हुए अमेरिकी नागरिकों के पासपोर्ट छिपा दिए थे. जब हालात बिगड़े और गोलीबारी शुरू हुई तो उन्होंने यात्रियों को इमरजेंसी गेट से बाहर निकालने में मदद की थी.

इस दौरान नीरजा ने बच्चों और दूसरे यात्रियों को बचाने की कोशिश की थी. वह खुद आतंकवादियों की गोलियों का शिकार हो गई थीं और उनका निधन हो गया था. भारत सरकार ने उनके इस अदम्य साहस के लिए उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया था. इंसानियत की मिसाल पेश करने वाली नीरजा को पाकिस्तान ने भी मरणोपरांत ‘तमगा-ए-इंसानियत’ से नवाजा था.

वक्त बदला, दौर बदला, लेकिन मुश्किल हालात से टकराने का भारतीयों का जज्बा आज भी वही है. करीब 40 साल बाद ऐसा ही साहस फिर देखने को मिला, जब एक भारतीय पायलट ने अपनी जान जोखिम में डालकर 174 लोगों को सुरक्षित बचा लिया.

30 सितंबर 2026 की तारीख देश के इतिहास में दर्ज हो गई है. इसी दिन फ्लाईदुबई की दुबई-तेल अवीव उड़ान के कॉकपिट में एक खौफनाक वारदात हुई थी. साथी पायलट ने भारतीय कैप्टन स्मित मच्छार पर कथित तौर पर जानलेवा हमला कर दिया था. इसके बावजूद लहूलुहान स्मित ने हिम्मत नहीं हारी थी और यात्रियों की सुरक्षा को अपनी प्राथमिकता बनाए रखा था.

बाद में यात्रियों की मदद से एक बड़ा विमान हादसा टाला जा सका. घटना के तुरंत बाद विमान का रास्ता बदलकर उसे सऊदी अरब के तबुक एयरपोर्ट पर सुरक्षित उतार लिया गया था. घायल कैप्टन स्मित को फौरन अस्पताल में भर्ती कराया गया था जहां उनकी हालत स्थिर बताई गई थी.

चार दशकों के अंतराल पर घटी इन दोनों घटनाओं की परिस्थितियां भले ही भिन्न थीं—नीरजा के सामने खूंखार अपहरणकर्ता थे और स्मित का सामना अपने ही सह-पायलट से था लेकिन दोनों की रगों में एक ही जज्बा था—मौत के साए में भी अपने कर्तव्य पर अडिग रहना और दूसरों की हिफाजत को पहला धर्म मानना.

नीरजा की कहानी बलिदान की कहानी बन गई. वह यात्रियों को बचाते हुए खुद अपनी जिंदगी हार गईं. स्मित की कहानी में भी खतरा उतना ही वास्तविक था लेकिन वह विमान को सुरक्षित उतारने और यात्रियों की जान बचाने के बाद इलाज के लिए अस्पताल पहुंच सके.

इन दोनों ही मामलों में वीरता का प्रदर्शन किसी मोर्चे पर नहीं हुआ था. विमान की चारदीवारी के भीतर जब सोचने का भी वक्त नहीं था, तब लिए गए त्वरित और साहसिक निर्णयों ने इन दोनों भारतीयों का नाम इतिहास में सुनहरे अक्षरों से दर्ज करा दिया.

 

BY IANS

भारत के दो नगीने नीरजा और स्मित: जान पर खेलकर इंसानियत को जिंदा रखा, अपने-पराए का भेद मिटाया


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