क्या था इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम जिस पर सुप्रीम कोर्ट ने लगाई रोक?
फाइल इमेज | आईएएनएस
राजनीतिक चंदे में पारदर्शिता लाने की पहल के तहत, केंद्र सरकार ने 2 जनवरी, 2018 को इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम की घोषणा की थी. चुनावी बॉन्ड किसी भी व्यक्ति जो भारतीय नागरिक है या व्यवसाय, संघ या निगम जिसका गठन या स्थापना भारत में हुई है, द्वारा भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआई) की अधिकृत शाखाओं से से खरीदा जा सकता था.
इलेक्टोरल बॉन्ड 1000 रुपये, 10000 रुपये, 1 लाख रुपये, 10 लाख, और 1 करोड़ रुपये के गुणकों में बेचे जाते थे. किसी राजनीतिक दल को को दान देने के लिए उन्हें केवाईसी-कम्प्लायंट अकाउंट के माध्यम से खरीदा जा सकता था.
राजनीतिक दलों को इन्हें जारी होने से 15 दिन के भीतर इनकैश (भुनाना) कराना होता था. इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए चंदा देने वाले डोनर का नाम और अन्य जानकारी दर्ज नहीं की जाती थी और इस प्रकार दानकर्ता गोपनीय हो जाता था. किसी व्यक्ति या कंपनी की तरफ से खरीदे जाने वाले चुनावी बॉन्ड की संख्या पर कोई लिमिट तय नहीं थी.
केंद्र ने इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम को लाने के लिए लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951, कंपनी अधिनियम 2013, आयकर अधिनियम 1961, और विदेशी योगदान विनियमन अधिनियम 2010 में संशोधन किए थे. संसद से पास होने के बाद 29 जनवरी 2018 को चुनावी बॉन्ड योजना को अधिसूचित किया गया था.
