भारत की पहली महिला महावत को मिला पद्मश्री, हाथियों को नियंत्रित करने का है लंबा अनुभव
सांकेतिक तस्वीर
गुवाहाटी | असम में ‘एलिफेंट गर्ल’ के नाम से मशहूर 67 वर्षीय पारबती बरुआ को पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया गया है. वह भारत की पहली महिला महावत हैं.
बरुआ को पशु संरक्षण में उनके काम के लिए यह पुरस्कार मिला है. पारबती बरुआ ने उस क्षेत्र में नाम कमाया है जिसमें पुरुषों का वर्चस्व रहा है.
असम के गोलपाड़ा जिले में गौरीपुर शाही परिवार में जन्मीं बरुआ और उनके पिता प्रकृतिश बरुआ ने पहला हाथी एक साथ तब पकड़ा था जब बरुआ 14 साल की थीं. उन्होंने उस हाथी को कोकराझार जिले के कचुगांव के जंगलों से पकड़ा था.

पारबती बरुआ ने मानव-हाथी संघर्ष को कम करने में 40 साल बिताए है और इस पेशे में लैंगिक रूढ़िवादिता के खिलाफ लड़ाई लड़ी है. असम में मानव-हाथी टकराव का एक लंबा इतिहास रहा है. बरुआ ने हाथियों को नियंत्रण में रखने के लिए सरकारी नियमों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
पारबती बरुआ जंगली हाथियों को वश में करने में माहिर है. हाथियों के व्यवहार पर उनकी विशेषज्ञता ने उन्हें न केवल असम में बल्कि आसपास के राज्यों जैसे पश्चिम बंगाल और ओडिशा में भी प्रसिद्ध कर दिया है.
बरुआ ने जंगली हाथियों को कृषि क्षेत्रों से जंगलों में वापस खदेड़ने में भी वन अधिकारियों की मदद की है. उनके ऊपर ब्रिटिश ट्रैवल राइटर और प्रकृतिवादी – मार्क रोलैंड शैंड ने एक किताब लिखी थी. इस किताब का शीर्षक था – ‘क्वीन ऑफ द एलिफेंट्स’. यह किताब साल 1996 में प्रकाशित हुई थी. बाद में, बीबीसी ने एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी जिसकी बड़े पैमाने पर प्रशंसा हुई थी.
महावत के रूप में 40 वर्षों तक काम करने वाली पारबती बरुआ ने अपना जीवन पशु संरक्षण के लिए समर्पित कर दिया है. वह वर्तमान में इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर के एशियाई हाथी विशेषज्ञ समूह (आईयूसीएन) का हिस्सा हैं.
यह उनके परिवार का दूसरा पद्म सम्मान है. केंद्र सरकार ने इससे पहले मशहूर लोक गायिका प्रतिमा पांडे बरुआ को पद्मश्री से सम्मानित किया था. प्रतिमा पारबती की बहन है.
हिंदी पोस्ट वेब डेस्क/आईएएनएस
