यूपी के इस गांव में नहीं मनाया जाता रक्षाबंधन का त्यौहार, जानिए वजह

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तस्वीर: पिक्साबे

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नई दिल्ली | गाजियाबाद से 30 किलोमीटर दूर स्तिथ मुरादनगर के सुराना गांव में 12वीं सदी से ही लोग रक्षाबंधन का त्योहार नहीं माना रहे हैं. इस गांव की बहू तो अपने भाइयों की कलाई पर राखी बांधती हैं, लेकिन इस गांव की लड़कियां रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाती. इतना ही नहीं इस गांव के लोग यदि कहीं दूसरी जगह भी जाकर बस जाते हैं तो भी वह रक्षाबंधन का त्योहार नहीं मनाते हैं. गांव के लोग इस दिन को काला दिन भी मानते हैं. सुराना गांव पहले सोनगढ़ के नाम से जाना जाता था. सुराना एक विशाल ठिकाना है छाबड़िया गोत्र के चंद्रवंशी अहीर क्षत्रियों का.

राजस्थान के अलवर से निकलकर छाबड़िया गोत्र के अहीरों ने सुराना में छोटी सी जागीर स्थापित कर गांव बसाया था. ग्राम का नाम सुराना यानि ‘सौ’ ‘राणा’ शब्द से मिलकर बना है.

ऐसा माना जाता है कि, जब अहीरों ने इस गांव को आबाद किया तब वे संख्या में सौ थे और राणा का अर्थ होता है योद्धा इसीलिए उन सौ क्षत्रीय अहीर राणाओं के नाम पर ही इस ठिकाने का नाम सुराना पड़ गया. गांव की कुल आबादी 22 हजार के करीब है. इसमें अधिकतर निवासी रक्षाबंधन का त्यौहार नहीं मनाते क्योंकि वह छाबड़िया गौत्र से हैं और वह इस दिन को अपशगुन मानते हैं. हालांकि जो लोग बाद में यहां निवास करने आए वह भी गांव की इस परंपरा को मानने लगे हैं.

तस्वीर: पिक्साबे
तस्वीर: पिक्साबे

इसके अलावा जो लोग गांव छोड़कर दूसरी जगह निवास करने चले गए हैं, वह भी रक्षाबंधन को नहीं मनाते. इसके साथ ही गांव में हर घर से एक व्यक्ति सेना या पुलिस में अपनी सेवा दे रहा है और हर साल उनके हाथों की कलाई सुनी रह जाती है.

गांव निवासी छाबड़िया राहुल सुराना ने आईएएनएस को बताया कि, छाबड़िया गौत्र के कोई भी व्यक्ति रक्षाबंधन का त्यौहार नहीं मनाता है. सैकड़ों साल पहले राजस्थान से आए पृथ्वीराज चौहान के वंशज सोन सिंह राणा ने हिंडन नदी के किनारे डेरा डाला था. जब मोहम्मद गौरी को पता चला कि सोहनगढ़ में पृथ्वीराज चौहान के वंशज रहते हैं, तो उसने रक्षाबंधन वाले दिन सोहनगढ़ पर हमला कर औरतों, बच्चों, बुजुर्ग और जवान युवकों को हाथियों के पैरों तले जिंदा कुचलवा दिया था.

गांव के लोगों के मुताबिक, इस गांव में मोहम्मद गोरी ने कई बार आक्रमण किया लेकिन हर बार उसकी सेना गांव में घुसने के दौरान अंधी हो जाती थी क्योंकि देवता इस गांव की रक्षा करते थे. वहीं रक्षाबंधन के दिन देवता गंगा स्नान करने चले जाते थे. जब इसकी सूचना मोहम्मद गौरी को लगी तो उसने मौके का फायदा उठाकर इस गांव पर हमला बोल दिया था.

तस्वीर: पिक्साबे
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एक अन्य गांव निवासी महावीर सिंह यादव ने बताया कि सन 1206 में रक्षाबंधन के दिन मोहम्मद गौरी ने गांव में आक्रमण किया था. आक्रमण के बाद यह गांव फिर बसा. गांव कैसे बसा इसके बारे में बताते हुए यादव ने कहा कि, आक्रमण वाले दिन गांव की एक महिला जसकौर उस दिन अपने पीहर (अपने घर) गई हुई थी. इसलिए वो बच गई. जसकौर गर्भवती थी. बाद में उन्होंने दो बच्चों ‘लकी’ और ‘चुंडा’ को जन्म दिया और दोनों बच्चों ने बड़े होकर वापस सोनगढ़ को बसाया.

गांव की प्रधान रेनू यादव बताती हैं कि, गांव में पुरानी परंपरा है कि यहां रक्षाबंधन नहीं मनाया जाता. छाबड़िया गौत्र की कुल आबादी करीब 8 हजार है जो यह रक्षाबंधन नहीं मनाते.

हिंदू पंचांग के अनुसार, प्रत्येक वर्ष श्रावण माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि पर रक्षाबंधन का त्योहार मनाया जाता है. रक्षाबंधन का पर्व भाई-बहन के आपस में स्नेह और प्रेम का प्रतीक है. रक्षाबंधन पर बहनें अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधते हुए उनकी आरती करते हुए भगवान से भाई की लंबी आयु और सुख-समृद्धि की कामना करती हैं. बहन के राखी बांधने के बदले में भाई सदैव उनकी रक्षा करने का वचन देता है.

आईएएनएस


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