सुप्रीम कोर्ट ने भतीजी से दुष्कर्म के आरोपी व्यक्ति की जमानत रद्द की

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फाइल इमेज | आईएएनएस
The Hindi Post

नई दिल्ली | सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपनी नाबालिग भतीजी से दुष्कर्म के एक आरोपी व्यक्ति की जमानत रद्द करते हुए कहा कि एक प्रवृत्ति उभर रही है, जहां अदालतें जमानत देने या इससे इनकार करने पर सामान्य अवलोकन (जनरल ऑब्जर्वेशन) पर जोर दे रही हैं।

न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी के साथ ही प्रधान न्यायाधीश एन. वी. रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि आरोपी को जमानत देने संबंधी राजस्थान उच्च न्यायालय का आदेश छिपा हुआ है और ऐसा लगता है कि दिमाग का उपयोग नहीं किया गया है।

पीठ ने फैसले पर नाराजगी जताते हुए कहा, “जमानत देने या देने से इनकार करने वाले ऐसे आदेश पारित करने का एक हालिया चलन है, जहां अदालतें एक सामान्य अवलोकन करती हैं कि तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार किया गया है। कोई विशिष्ट कारण इंगित नहीं किया गया है, जिससे अदालत द्वारा आदेश पारित किया गया है।”

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पीठ ने कहा कि इस तरह की स्थिति इस अदालत के विभिन्न फैसलों के बावजूद जारी है, जिसमें उसने इस तरह की प्रथा को अस्वीकार कर दिया है। यह नोट किया गया कि ओमप्रकाश पर अपनी युवा भतीजी के खिलाफ दुष्कर्म का गंभीर अपराध करने का आरोप लगाया गया है और वह एक आदतन अपराधी भी है और उसके खिलाफ लगभग बीस मामले दर्ज हैं, जिनका उच्च न्यायालय के आदेश में उल्लेख नहीं किया गया।

पीठ ने उच्च न्यायालय के आदेश को खारिज करते हुए आरोपी को एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया। पीठ ने आगे कहा, “इसके अलावा उच्च न्यायालय उस प्रभाव पर विचार करने में विफल रहा है जो ओमप्रकाश के परिवार के एक बड़े सदस्य के रूप में अभियोक्ता पर हो सकता है। कारावास की अवधि, केवल तीन महीने की है और यह इतनी परिमाण की नहीं है कि अदालत को इस प्रकार के अपराध में जमानत देने की दिशा में कदम उठाना पड़े।”

पीठ ने कहा कि सामान्य अवलोकन के अलावा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखा गया है, कहीं भी मामले के वास्तविक तथ्यों को प्रदर्शित नहीं किया गया है।

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पीठ ने कहा, “ऐसा प्रतीत होता है कि उन कारकों का कोई संदर्भ नहीं है जो अंतत: उच्च न्यायालय को जमानत देने के लिए प्रेरित करते हैं। वास्तव में, आक्षेपित आदेश से कोई तर्क स्पष्ट नहीं है। तर्क न्यायिक प्रणाली का जीवन रक्त है। हर आदेश का तर्क होना चाहिए और यह हमारी प्रणाली के मूलभूत सिद्धांतों में से एक है। एक अकारण आदेश को मनमानी का दोष भुगतना पड़ता है।”

शीर्ष अदालत का आदेश पीड़िता द्वारा उच्च न्यायालय के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर आया, जिसने 20 सितंबर, 2021 को आरोपी को नियमित जमानत दी थी। इस मामले में पिछले साल मई में प्राथमिकी दर्ज की गई थी।

शीर्ष अदालत ने आरोपपत्र का हवाला देते हुए कहा कि पीड़िता ने दावा किया है कि आरोपी ने उसके साथ दो मौकों पर दुष्कर्म किया। राज्य सरकार के वकील ने कहा कि आरोपी ने अपनी नाबालिग भतीजी के साथ करीब तीन से चार साल तक दुष्कर्म किया और यौन उत्पीड़न जैसा जघन्य अपराध किया।

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वकील ने कहा कि आरोपी एक कुख्यात अपराधी है, जिसके खिलाफ बीस आपराधिक मामले दर्ज हैं, जिनमें से कुछ में उसे पहले ही दोषी ठहराया जा चुका है। उसके खिलाफ दर्ज मामलों की सूची में हत्या, हत्या के प्रयास, अपहरण, डकैती आदि से संबंधित मामले शामिल हैं। इस लिहाज से उच्च न्यायालय के आदेश को रद्द करने की मांग की गई है।

पिछले आदेशों का हवाला देते हुए, पीठ ने कहा कि यह स्पष्ट है कि इस अदालत ने गंभीर अपराधों से जुड़े मामलों पर विशेष जोर देने के साथ तर्कसंगत जमानत आदेशों की आवश्यकता को लगातार बरकरार रखा है।

पीठ ने कहा, “उच्च न्यायालय द्वारा पारित आक्षेपित आदेश को रद्द किया जाता है। तदनुसार आपराधिक अपील की अनुमति दी जाती है। जमानत बांड रद्द किए जाते हैं। अभियुक्त को इस आदेश की प्राप्ति से एक सप्ताह के भीतर आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया जाता है और ऐसा न करने पर संबंधित पुलिस अधिकारी उसे हिरासत में ले लेंगे।”

आईएएनएस

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