हाईकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप को बताया टाइमपास जैसा, प्रेमी जोड़े की याचिका को किया खारिज
सांकेतिक तस्वीर (पिक्साबे)
अलग-अलग धर्मों को मानने वाले एक कपल (जोड़े) की याचिका को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने खारिज कर दिया है. इस कपल ने दरअसल, पुलिस सुरक्षा की मांग की थी. कोर्ट ने उनकी याचिका को खारिज करते हुए कहा कि ऐसे रिश्ते स्थाई नहीं होते. अदालत ने ‘लिव-इन’ रिलेशनशिप को ‘टाइमपास’ की संज्ञा दी है.
कोर्ट ने कहा कि जब तक यह कपल इस रिश्ते को शादी के जरिए कोई नाम देने को तैयार न हो, इसे संरक्षण देने का आदेश नहीं दिया जा सकता.
यह कहते हुए कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मौकों पर लिव-इन रिलेशनशिप को वैध ठहराया है, हाई कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की कम उम्र और साथ रहने में बिताए गए समय पर सवाल उठाया कि क्या यह सावधानीपूर्वक सोचा गया निर्णय था.
अदालत ने आगे टिप्पणी की कि लिव-इन रिलेशनशिप “अस्थायी और नाजुक” होते हैं और “टाइमपास” में बदल जाते हैं.
कोर्ट ने कहा, “जिंदगी गुलाबों की सेज नहीं है. यह हर जोड़े को कठिन वास्तविकताओं के धरातल पर परखती है. हमारा अनुभव बताता है कि इस प्रकार के रिश्ते अक्सर टाइमपास, अस्थायी और नाजुक होते हैं.”
कोर्ट ने हस्तक्षेप करने से इंकार करते हुए याचिका खारिज कर दी. यह आदेश न्यायमूर्ति राहुल चतुर्वेदी और न्यायमूर्ति एमएएच इदरीसी की खंडपीठ ने कुमारी राधिका और सोहैल खान की याचिका पर दिया है.
कपल ने पुलिस सुरक्षा की मांग करते हुए एक याचिका दायर की थी और भारतीय दंड संहिता की धारा 366 के तहत दर्ज की गई FIR को रद्द करने की मांग की थी. इस FIR को युवती की बुआ ने दर्ज कराया था.
शिकायतकर्ता (युवती की आंटी/बुआ) की तरफ से विरोध किया गया कि लड़की के साथी के खिलाफ आगरा के छाता थाने में गैंगस्टर एक्ट की धारा 2/3 के तहत प्राथमिकी दर्ज है. उन्होंने युवक को रोड-रोमियो बताया और कहा कि उसके साथ युवती का कोई भविष्य नहीं है. वो निश्चित तौर पर लड़की का भविष्य बर्बाद कर देगा.
उन्होंने कहा कि युवक के खिलाफ पहले से ही उत्तर प्रदेश गैंगस्टर अधिनियम की धाराओं के तहत एक प्राथमिकी दर्ज है.
इसमें से एक याची के चचेरे भाई अहसान फिरोज ने हलफनामा देकर याचिका दाखिल की थी और कहा था कि दोनों लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहते हैं. इसलिए अपहरण के आरोप में बुआ द्वारा मथुरा के रिफाइनरी थाने में दर्ज एफआईआर रद्द की जाए और गिरफ्तारी पर रोक लगाते हुए पुलिस संरक्षण दिया जाए.
खंडपीठ ने कहा, ‘कोर्ट का मानना है कि इस प्रकार के रिश्ते में स्थिरता और ईमानदारी की तुलना में लगाव अधिक है, जब तक जोड़े शादी करने का फैसला नहीं करते हैं और अपने रिश्ते को नाम नहीं देते हैं या वे एक-दूसरे के प्रति ईमानदार नहीं होते हैं, तब तक अदालत इस प्रकार के रिश्ते में कोई राय व्यक्त करने से बचेगी.’
याची ने दलील दी कि उसकी उम्र 20 साल से अधिक है और बालिग होने के नाते उसे अपना भविष्य तय करने का पूरा अधिकार है. वहीं लड़की ने कहा कि उसने लड़के को अपने प्रेमी के रूप में चुना है, जिसके साथ वह लिव-इन रिलेशनशिप में रहना चाहती है.
अदालत ने मामले की सुनवाई के कोई भी सुरक्षा देने से इनकार कर दिया.
हिंदी पोस्ट वेब डेस्क
(इनपुट्स: आईएएनएस)
