भोजशाला फैसले पर ओवैसी ने उठाए सवाल, कहा- ‘पूजा स्थल अधिनियम मजाक बना दिया गया है’

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Photo: IANS

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भोजशाला फैसले पर ओवैसी ने उठाए सवाल, कहा- ‘पूजा स्थल अधिनियम मजाक बना दिया गया है’

 

हैदराबाद | धार भोजशाला मामले में आए फैसले पर एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाए हैं. उन्होंने कहा कि यह फैसला संवैधानिक मूल्यों के अनुरूप नहीं है. अदालत ने कई महत्वपूर्ण दस्तावेजों व कानूनी पहलुओं को नजरअंदाज किया है.

उन्होंने कहा कि ऐसा कहा जा रहा है कि वहां एक मंदिर था लेकिन वहां मिले शिलालेखों से पता चलता है कि वह एक गुरुकुल था जहां राजा भोज ने संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा दिया. जिस प्रकार हम संसद को लोकतंत्र का मंदिर कहते हैं, इसका यह अर्थ नहीं है कि वह पूजा स्थल है.

हैदराबाद में मीडिया से बातचीत के दौरान ओवैसी ने कहा कि अदालत ने 1935 के धार स्टेट गजट, 1985 के वक्फ रजिस्ट्रेशन और पूजा स्थल अधिनियम को नजरअंदाज कर दिया. उन्होंने कहा कि अदालत ने इस मामले से जुड़े चल रहे सिविल विवाद और मालिकाना हक के मुद्दे पर भी ध्यान नहीं दिया.

उन्होंने कहा कि एएसआई 1951 और 1952 में यह कह चुका है कि ये मस्जिद है. भोज उत्सव मनाने के लिए तब एएसआई ने परमिशन देने से मना कर दिया था.

ओवैसी ने कहा कि यह फैसला बिल्कुल बाबरी मस्जिद मामले की तरह है. बाबरी मस्जिद मामले में अदालत ने कहा था कि मुसलमानों का उस जगह पर कब्जा नहीं था लेकिन भोजशाला मामले में आज तक मुस्लिम पक्ष का कब्जा बना हुआ था.

ओवैसी ने कहा कि उन्होंने पहले भी बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद पर आए फैसले को गलत बताया था और कहा था कि वह फैसला सिर्फ आस्था के आधार पर दिया गया था. उस समय उन्होंने चेतावनी दी थी कि यह फैसला भविष्य में ऐसे कई और विवादों का रास्ता खोल देगा.

एआईएमआईएम प्रमुख ने कहा कि उस वक्त कई लोगों ने उन्हें चुप रहने की सलाह दी थी, लेकिन आज वही स्थिति सामने आ रही है, जिसकी उन्होंने आशंका जताई थी. बाबरी मस्जिद मामले में जो आधार बनाया गया था, उसी तरह की राहत अब इस मामले में भी दी गई है. यह फैसला संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है. बाबरी मस्जिद-राम मंदिर विवाद के फैसले में एक धर्म को प्राथमिकता दी गई और दूसरे धर्म के पूजा अधिकारों को कमजोर किया गया.

उन्होंने कहा कि इस फैसले से अब नए विवादों का रास्ता खुल गया है और भविष्य में कोई भी व्यक्ति किसी भी धार्मिक स्थल को चुनौती दे सकता है. सुप्रीम कोर्ट ने बाबरी मस्जिद-राम मंदिर फैसले में पूजा स्थल अधिनियम को संविधान की मूल संरचना से जोड़ा था लेकिन मौजूदा फैसले में इस कानून को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया है.

उन्होंने यह भी कहा कि 1995 में कुछ गुलाम परस्त मुसलमानों ने दस रुपए के स्टैम्प पेपर पर लिखकर मंगलवार को पूजा करने की अनुमति दे दी. उन्होंने गलती की. वह किसी के या मेरे अब्बा या अम्मी की प्रॉपर्टी नहीं है. वह एक मस्जिद है, उसका मालिक अल्लाह होता है. पूजा स्थल अधिनियम का मजाक बना दिया गया है. उन्होंने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट से उन्हें न्याय मिलेगा.

 


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