इजराइल के विपक्ष की धमकी – पीएम मोदी के भाषण का कर सकते है बहिष्कार, प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के सामने रखी यह मांग

PM Narendra Modi and Israel PM Netanyahu (1)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू (फाइल फोटो वाया आईएएनएस)

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पीएम मोदी की इजरायल यात्रा से किसे परेशानी ? नेतन्याहू को इस बात की मिली चेतावनी…

 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आगामी इजरायल यात्रा से ठीक पहले इस (इजराइल) देश का पक्ष और विपक्ष आमने-सामने आ गया है. दरअसल, पीएम मोदी 25 फरवरी को इजराइल की यात्रा पर जा रहे है. वो वहां की संसद को संबोधित करेंगे. उससे पहले इजराइल में विपक्ष के नेता यार लापिड ने प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को कड़ी चेतावनी दी है.

उनका कहने है कि यदि लोकतांत्रिक परंपरा का पालन करते हुए इजरायली सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को इस विशेष सत्र में (जिसको पीएम मोदी संबोधित करेंगे) आमंत्रित नहीं किया गया, तो विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी के भाषण का बहिष्कार कर सकता है.

लापिड का तर्क है कि भारत के प्रधानमंत्री का केनेसेट (संसद) आना पूरे देश के लिए सम्मान की बात है और वह नहीं चाहते कि एक अरब से अधिक आबादी वाले देश के नेता को ‘आधे खाली सदन’ के सामने खड़ा होना पड़े (भाषण देते समय). लापिड की तरफ से कहा गया कि हम पीएम मोदी के भाषण के बहिष्कार के लिए नहीं कह रहे हैं लेकिन सरकार हमें जानबूझकर ऐसी स्थिति में डालने की कोशिश कर रही है.

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, जस्टिस अमिट को सरकार का विरोधी माना जाता है. जनवरी 2025 में उनके सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष चुने जाने के बावजूद, नेतन्याहू सरकार ने उन्हें मुख्य न्यायाधीश के रूप में आधिकारिक मान्यता नहीं दी है और न ही उनका नाम सरकारी गजट में प्रकाशित किया गया है. इसी राजनीतिक द्वेष के कारण सरकार उन्हें आधिकारिक कार्यक्रमों और संसद के सत्रों से दूर रख रही है. लापिड के अनुसार, इस खींचतान से भारतीय दूतावास भी चिंतित है, क्योंकि भारत इस आंतरिक विवाद में घसीटे जाने के पक्ष में नहीं है.

दूसरी ओर, नेतन्याहू सरकार और केनेसेट के स्पीकर अमिर ओहाना ने विपक्ष के इस रुख की तीखी आलोचना की है. सरकार का आरोप है कि यार लापिड अपनी घरेलू राजनीति साधने के लिए भारत और इजरायल के रणनीतिक और मैत्रीपूर्ण संबंधों को दांव पर लगा रहे हैं. स्पीकर ओहाना ने लापिड की मंशा पर सवाल उठाते हुए पूछा कि उन्होंने पिछले दौरों के दौरान अन्य वैश्विक नेताओं के संबोधन का बहिष्कार क्यों नहीं किया.

फिलहाल, यह देखना दिलचस्प होगा कि पीएम मोदी के 25 फरवरी के दौरे से पहले नेतन्याहू सरकार इस कूटनीतिक संकट को सुलझाने के लिए विपक्ष की मांगों के आगे झुकती है या नहीं.

 

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