रोते हुए गाया था आशा भोसले ने इस फिल्म का गाना, एसडी बर्मन से पड़ी थी जबरदस्त डांट

Asha Bhosle (1)

फोटो: आईएएनएस

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रोते हुए गाया था आशा भोसले ने इस फिल्म का गाना, एसडी बर्मन से पड़ी थी जबरदस्त डांट

 

नई दिल्ली |  आशा ताई नहीं रहीं. हिंदी फिल्म जगत और उनके चाहने वाले उन्हें प्यार से ‘ताई’ ही कहते थे. इनका हरेक गाना एक मिसाल और धुआंधार था. कहां तान लेनी है, किस अंतरे पर आवाज के साथ खेलना है, कौन सी जगह पर भावनाओं का तड़का लगाना है और कहां मुरकी लेकर हैरान करना है, इसमें माहिर थीं पद्म विभूषण आशा भोसले. जैसे आग में तपकर सोना कुंदन बन जाता है, वैसा ही इस जिद्दी सिंगर के लिए कहा जा सकता है. लता की बहन को सब कुछ थाली में सजा कर नहीं मिला; बड़ा जतन किया रियाज करते हुए गायकी में धमक के साथ अपना मुकाम बनाने के लिए!

किस्से बहुत हैं. कुछ दर्द से भरे तो कुछ जीवन की आपाधापी में मिली सीख से जुड़े! विभिन्न मंचों पर जब ‘बंदिनी’ का जिक्र छिड़ता तो इस किस्से को आशा भोसले अकसर याद किया करतीं. उनके अनुसार, इस गाने को उन्होंने रो-रोकर रिकॉर्ड किया था.

1963 में बिमल रॉय की ‘बंदिनी’ रिलीज हुई. नूतन, धर्मेंद्र और अशोक कुमार ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं. गुलजार ने भी ‘मोरा गोरा अंग लइ ले’ इस फिल्म में बतौर गीतकार डेब्यू किया था. संगीत दिया था एसडी बर्मन यानी सचिन देव बर्मन ने. एक गाना था जिसे उन्होंने ‘आसा’ (आशा भोसले को इसी नाम से पुकारते थे सचिन दा) को गाने के लिए सौंपा.

माइक्रोफोन पर गाने आईं तो टेक्निकली बिल्कुल ठीक थीं. गाना भी रौ में था, लेकिन वो बात नहीं थी जिसकी अपेक्षा सचिन देव बर्मन कर रहे थे. फिर क्या, दादा नाराज हो गए और बोले, “आसा, क्या ‘बाल’ तुम्हारा भाई नहीं है? क्या तुम उसे राखी नहीं बांधती?”

आशा का निजी जीवन तब काफी दर्द से गुजर रहा था. उन्होंने खुद बताया, “उस समय, मेरी शादी हो चुकी थी और मैं अपने परिवार से अलग रह रही थी; मुझे अपने भाई बाल (हृदयनाथ मंगेशकर) की इतनी ज्यादा याद आ रही थी कि मैं रो पड़ी. दादा ने तुरंत ‘टेक’ के लिए तैयार होने को कहा, और फिर मैंने वह गाना एक ही टेक में रिकॉर्ड कर दिया.”

एक औरत के दर्द को बयां करता गाना लोगों को बहुत पसंद आया. शैलेंद्र के बोलों से सजा, बेटी की पीड़ा को दर्शाता खूबसूरती से पिरोया गीत दशकों बाद भी श्रोताओं के दिल को छू जाता है.

यही आशा की पहचान रही. गाने ऐसे गाए जो दिल के तारों को छेड़ जाएं. ताई जिनकी मंझी आवाज शोखी, चुलबुलेपन का पर्याय बनी तो “इन आंखों की मस्ती” समेत “उमराव जान” की गजलों और गीतों को आवाज दे संजीदगी का एहसास भी कराया. धुन की पक्की गायिका भले आज दुनिया से विदा ले चुकी हों, लेकिन ये भी सच है कि वो हमेशा जिंदा रहेंगी. अपने सुनने वालों के दिलों पर उनका राज रहेगा क्योंकि आवाजें जो दिलों पर खुरच कर लिख दी जाती हैं, कभी मरा नहीं करतीं!

IANS

यादों में आशा: रोते हुए गाया था ‘बंदिनी’ का वो गीत, एसडी बर्मन से पड़ी थी जबरदस्त डांट


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