“पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना ‘क्रूरता’ नहीं”: हाई कोर्ट

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सांकेतिक तस्वीर (AI Photo)

The Hindi Post

अहम फैसला : “पत्नी को थप्पड़ मारना क्रूरता नहीं”, हाई कोर्ट ने 23 साल बाद आरोपी पति को क्यों दी राहत ?

 

बिना बताए मायके में रात बिताने पर पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना ‘क्रूरता’ की श्रेणी में नहीं आएगी. गुजरात हाई कोर्ट ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 498A के तहत एक व्यक्ति की दोषसिद्धि (सजा) को उलटते हुए यह टिप्पणी की.

हाई कोर्ट ने इस व्यक्ति को धारा 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के आरोप से भी बरी कर दिया क्योंकि उसे महिला के साथ लगातार मारपीट या प्रताड़ना का कोई ठोस साक्ष्य (cogent evidence) नहीं मिला जिसके आधार पर यह साबित हो सके कि उसे आत्महत्या के लिए मजबूर किया गया था.

दरअसल, एक युवक और युवती का वर्ष 1995 में विवाह हुआ था. वे वलसाड जिले के सरीगाम पहाड़पाड़ा में रहते थे. मई 1996 में, महिला ने पेड़ से नायलॉन की रस्सी के सहारे फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी. मृतका के पिता ने पुलिस केस दर्ज कराया था. उन्होंने अपने दामाद पर क्रूरता और उत्पीड़न का आरोप लगाया था. उनका कहना था कि इसके परिणामस्वरूप उनकी बेटी ने आत्महत्या कर ली थी.

शिकायतकर्ता (पिता) ने आरोप लगाया कि उनका दामाद म्यूजिकल पार्टियों में बैंजो बजाने के बाद देर रात घर आता था और उनकी बेटी के साथ मारपीट करता था. एक बार, जब पत्नी (बिना बताए) अपने मायके में रात भर रुक गई, तो पति वहां पहुंचा और अपनी जानकारी के बिना मायके में रहने के कारण पत्नी को थप्पड़ मार दिया. पुलिस ने इस मामले में पति के खिलाफ आईपीसी (IPC) की धारा 498A (क्रूरता) और 306 (आत्महत्या के लिए उकसाना) के तहत मुकदमा दर्ज किया था.

ट्रायल (मुकदमे की सुनवाई) के बाद, 2003 में वलसाड की एक सत्र अदालत (Sessions Court) ने इस व्यक्ति (महिला के पति) को दोषी करार दिया था. अदालत ने उसे आईपीसी की धारा 498A के तहत एक वर्ष के कारावास और धारा 306 के तहत सात वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

उसने (महिला के पति) अपनी दोषसिद्धि (Conviction) को हाई कोर्ट में चुनौती दी. कोर्ट ने निचली अदालत (Trial Court) के आदेश को पलटते हुए सजा रद्द कर दी.

हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि झगड़ा केवल इस बात पर था कि पति विवाह समारोहों में ‘बैंजो’ बजाने के लिए रात में बाहर जाता था और देर से लौटने पर पति-पत्नी के बीच विवाद होता था. हाई कोर्ट ने आगे कहा, “बिना सूचित किए मायके में रात बिताने के आधार पर पति द्वारा पत्नी को थप्पड़ मारने की एक अकेली घटना को ‘क्रूरता’ नहीं माना जाएगा.”

व्यक्ति को आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप से दोषमुक्त करते हुए, हाई कोर्ट ने कहा, “आत्महत्या के तात्कालिक कारण (proximate cause) सिद्ध नहीं हुए. निरंतर और असहनीय मारपीट को प्रमाणित मानने के लिए ठोस साक्ष्यों (cogent evidence) की आवश्यकता होती है, ताकि उसे उस ‘क्रूरता’ के रूप में स्वीकार किया जा सके जिसने महिला को कोई अन्य विकल्प न पाकर फांसी लगाकर आत्महत्या करने के लिए विवश किया हो. कोर्ट में पेश किए गए गवाह, क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले को साबित करने में विफल रहे. ट्रायल कोर्ट (निचली अदालत) द्वारा निकाला गया निष्कर्ष त्रुटिपूर्ण था. अतः दोषसिद्धि और सजा को बरकरार नहीं रखा जा सकता.”

 

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