विज्ञान और इलाज में तरक्की फिर भी कैंसर से जंग में क्यों पीछे है दक्षिण-पूर्व एशिया? WHO ने गिनाईं बड़ी चुनौतियां

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सांकेतिक तस्वीर / (फोटो क्रेडिट: आईएएनएस)

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विज्ञान और इलाज में तरक्की फिर भी कैंसर से जंग में क्यों पीछे है दक्षिण-पूर्व एशिया? WHO ने गिनाईं बड़ी चुनौतियां

 

नई दिल्ली | कैंसर आज भी दुनियाभर में मौत का एक बड़ा कारण बना हुआ है और यह न सिर्फ मरीज बल्कि उनके परिवार के लिए भी बहुत तकलीफ लेकर आता है.

दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में ही साल 2022 में अनुमानित 1.9 मिलियन नए कैंसर के केस सामने आए और 1.3 मिलियन लोगों की मौत हुई. इसमें से 56 हजार से ज्यादा केस बच्चों के थे. भले ही विज्ञान और इलाज में काफी तरक्की हुई है, लेकिन यह बोझ लगातार बढ़ रहा है और अनुमान है कि 2050 तक नए केस और मौतों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी. विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) ऑफिसर-इन-चार्ज डॉ. कैथरीना बोहेम ने बताया कि इस साल वर्ल्ड कैंसर डे का थीम है ‘यूनाइटेड बाय यूनिक’. कैंसर एक ग्लोबल खतरा है, लेकिन हर देश, हर शहर और हर व्यक्ति इससे अलग तरीके से प्रभावित होता है. इसलिए इसका सही इलाज और रोकथाम तभी संभव है जब हम मिलकर काम करें और स्थानीय जरूरतों के हिसाब से योजना बनाएं.

डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र की 2024-2030 की कैंसर रोकथाम और प्रबंधन रणनीति के तहत देशों की मदद कर रहा है. इसका मतलब है कि देश अपनी नेशनल कैंसर कंट्रोल प्लान बना सकें, कैंसर रजिस्ट्रियों को मजबूत किया जाए, जल्दी डायग्नोसिस और इलाज का स्तर सुधारा जाए और पेलियेटिव केयर तक आसान पहुंच सुनिश्चित की जाए. वहीं, साथ काम करना बेहद जरूरी है. डब्ल्यूएचओ, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों जैसे आईएईए और आईएआरसी के साथ मिलकर देशों को उनकी स्थिति का बेसलाइन एनालिसिस और सुझाव दे रहा है ताकि सही योजना और निवेश किया जा सके.

इसके अलावा, प्लेटफॉर्म जैसे एसईएआर-सीसीएन (बच्चों के कैंसर के लिए) और दक्षिण पूर्व एशिया कैंसर ग्रिड (सीकैन ग्रिड) देशों के बीच सहयोग को मजबूत कर रहे हैं. सीकेन ग्रिड यह भी सुनिश्चित करता है कि हर देश के स्थानीय हालात के अनुसार वैज्ञानिक साक्ष्य का सही इस्तेमाल हो. क्षेत्र के कई देश इन प्रयासों में आगे भी हैं और नई पहल कर रहे हैं. उदाहरण के लिए, थाईलैंड का “कैंसर एनीवेयर” प्रोग्राम लोगों को किसी भी पब्लिक हॉस्पिटल में इलाज की सुविधा देता है. भारत जिले के अस्पतालों में डे-केयर केमोथेरेपी सेंटर बढ़ा रहा है. भूटान की पॉपुलेशन बेस्ड कैंसर रजिस्ट्री पूरे देश से डेटा इकट्ठा करती है, जिससे रोकथाम के प्रोग्राम और इलाज की गुणवत्ता बेहतर बन सके.

बच्चों के कैंसर के लिए भी कई देशों ने कदम उठाए हैं. म्यांमार ने सैटेलाइट सेंटर नेटवर्क के जरिए इलाज की पहुंच बढ़ाई, नेपाल ने बच्चों के कैंसर का इलाज मुफ्त कर दिया और श्रीलंका ने बच्चों के कैंसर के लिए अलग राष्ट्रीय नीति बनाई. ये उदाहरण दिखाते हैं कि अगर इच्छाशक्ति हो तो बदलाव संभव है लेकिन चुनौतियां अभी भी बड़ी हैं. दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में कैंसर का मृत्यु-से-इंसीडेंस अनुपात उच्च आय वाले देशों की तुलना में लगभग दो गुना है और बच्चों के कैंसर में तीन गुना है. सभी देशों ने अभी तक राष्ट्रीय कैंसर नियंत्रण योजना नहीं बनाई है. कई जगह स्क्रीनिंग कवरेज कम है और डायग्नोसिस तथा इलाज की सेवाओं तक पहुंच भी असमान है. इसलिए अब जरूरत है राजनीतिक इच्छाशक्ति और लंबे समय तक निवेश की.

आईएएनएस

 


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